आलू भारत की सबसे महत्वपूर्ण कंद वाली फसल है और अपनी उच्च उत्पादकता और पोषण मूल्य के कारण यह एक मुख्य भोजन, सब्जी और औद्योगिक कच्चे माल के रूप में काम आती है।
भारत दुनिया भर में आलू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, और इसकी खेती खाद्य सुरक्षा, प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) उद्योगों और किसानों की आजीविका में सहायता करती है।
आलू कार्बोहाइड्रेट, विटामिन सी, पोटेशियम और आहार फाइबर से भरपूर होता है, जो इसे संतुलित आहार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।
फॉस्फोरस जड़ों के शुरुआती जमाव और स्टोलन (भूमिगत तने) के विकास को बढ़ावा देता है, जिससे कंद (आलू) बनने के लिए एक मजबूत आधार तैयार होता है।
कंद (आलू) की पैदावार और आकार
फॉस्फोरस की उचित मात्रा कंद बनने की शुरुआत, उनके आकार में वृद्धि और शुष्क पदार्थ के जमाव को बढ़ाती है, जिससे बाजार में बिकने योग्य उपज (पैदावार) अधिक मिलती है।
गुणवत्ता और भंडारण क्षमता
फॉस्फोरस का संतुलित पोषण पोषक तत्वों के उपयोग की क्षमता में सुधार करता है और कंद (आलू) की बेहतर गुणवत्ता, अधिक समय तक भंडारण (स्टोर) करने की क्षमता और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) के लिए उपयुक्तता बढ़ाने में योगदान देता है।
सरकार द्वारा अनुशंसित खाद की उपयुक्त मात्रा (किलो प्रति हेक्टेयर)
नाइट्रोजन
187.5
फॉस्फोरस
62.5
पोटेशियम
62.5
सूक्ष्मपोषक
एफवाईएम
50
टन
बुआई और मिट्टी चढ़ाते समय प्रत्येक बार 20 किलो दानेदार (granule) खाद डालें और कंद (आलू) बनने की शुरुआत में 500 मिली बायोज़ाइम (Biozyme) तरल फॉर्मूलेशन का छिड़काव करने से आलू की पैदावार बढ़ती है।
OCP Nutricrops TSP डोज़: P की आवश्यकता हेतु (किलो प्रति हेक्टेयर)
डोज़
136
इस्तेमाल का सही तरीका
बुआई के समय पूरे टीएसपी को सीड ड्रिल के द्वारा या बिखेर कर डालें।
टीएसपी से फॉस्फोरस (P) डालते समय 45 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर मिलाएँ।